तुझे कागज़ पर मैं लिखता रहा
कागज़ पढ़ पढ़ शरमाता रहा
छू रहे थे मेरे कलम तेरे बदन को
मैं सितारों के बीच , चाँद तुझको कहता रहा
मैं बहकता रहा सम्भलता रहा
तेरे आग से बदन को मैं फिर भी शीतल कहता रहा
मेरे क़लम से कागज पर अंग अंग तेरा नीखरता रहा
तेरा यौवन बनकर शराब मेरे कलम से कागज़ पर छलकता रहा
जल्दी थी नहीं आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता रहा मंजिल की ओर
और तूझे ही नशा शराब ख़ाब उन्माद गजलों में कहता रहा
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